(संवाद एक्सप्रेस)गरियाबंद। अगर धान बोल पाता तो शायद कहता— “मुझे खेत में बोया गया था, लेकिन मेरी किस्मत बॉर्डर पार बिकने के लिए लिखी थी!”
गरियाबंद पुलिस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जिले में धान सिर्फ किसानों की मेहनत नहीं, बल्कि तस्करों की कमाई का भी बड़ा जरिया बन चुका है।
विगत एक माह, 18 दिवस में पुलिस ने ऐसा विशेष अभियान चलाया कि धान के कट्टे गिनते-गिनते कैलकुलेटर भी शर्म से बंद हो जाए। नतीजा—
👉 2176.3 क्विंटल अवैध धान,
👉 कीमत करीब 66 लाख 50 हजार 740 रुपये,
👉 41 चारपहिया वाहन + 4 लावारिस धान,
👉 कुल 45 प्रकरण।
यानि अगर धान से सड़क बनती तो गरियाबंद से ओडिशा तक एक्सप्रेसवे तैयार हो जाता।
बॉर्डर पर ‘धान दर्शन’
छत्तीसगढ़ शासन कहता है— धान खरीदी सिर्फ पंजीकृत किसानों से होगी।
और तस्कर कहते हैं— “ठीक है, हम पंजीकरण नहीं, परिवहन में विश्वास रखते हैं।”
इसी विश्वास का नतीजा यह रहा कि 26-27 दिसंबर 2025 को देवभोग, अमलीपदर और छुरा थाना क्षेत्र में पुलिस ने धान-परिवहन महोत्सव पर अचानक रेड डाल दी।
देवभोग में बोलेरो और लीलैंड ऐसे पकड़े गए जैसे स्कूल में नकल करते छात्र।
अमलीपदर में बोलेरो से 70 कट्टा धान ऐसे निकला मानो डिक्की नहीं, गोदाम हो।
छुरा में भी बोलेरो ने कबूल कर लिया— “हां साहब, धान मेरा ही है, कागज नहीं है।”
कुल मिलाकर 290 कट्टा (119.5 क्विंटल) धान जप्त हुआ, जिसकी कीमत 3.70 लाख रुपये बताई जा रही है।
कागज पूछो तो सन्नाटा
पुलिस ने जब वैध दस्तावेज मांगे तो जवाब मिला—
“धान है साहब, कागज नहीं।”
बस फिर क्या था, धान को सीधे सरकारी मेहमान बना दिया गया और संबंधित विभाग के हवाले कर दिया गया।
धान तस्करों का नया गणित
धान तस्करी अब खेती नहीं, लॉजिस्टिक्स बिजनेस बन चुकी है—
बोलेरो = मिनी गोदाम
बॉर्डर = फ्री ट्रांजिट जोन
कागजात = वैकल्पिक सुविधा
लेकिन पुलिस के इस अभियान ने साफ कर दिया कि यह गणित अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा।
पुलिस का साफ संदेश
गरियाबंद पुलिस ने दो टूक कहा है—
“अवैध धान परिवहन और बिक्री के विरुद्ध कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।

Satyanarayan Vishwakarma serves as the Chief Editor of Samwad Express, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering topics such as local and regional developments

















