(संवाद एक्सप्रेस)मैनपुर। गरियाबंद।जिस पुल के निर्माण के लिए मैनपुर कला के ग्रामीणों ने करीब 20 वर्षों तक संघर्ष किया, धरना-प्रदर्शन किए, चक्का जाम किया, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने बार-बार गुहार लगाई, उसी पुल ने उद्घाटन के महज चार महीने के भीतर ही निर्माण गुणवत्ता की पोल खोल दी है। करोड़ों रुपये की लागत से बने पुल के एप्रोच रोड में अचानक गहरा सुरंगनुमा गड्ढा बन गया है, जिसने न केवल निर्माण एजेंसी बल्कि संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बारिश शुरू होते ही पुल के एप्रोच रोड का धंस जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं निर्माण कार्य में भारी लापरवाही या गुणवत्ता से समझौता किया गया है। यदि समय रहते स्थानीय लोगों की नजर इस गड्ढे पर नहीं पड़ती तो किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता था। ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर गड्ढे में लकड़ी गाड़कर लोगों को सावधान करने की व्यवस्था की।

क्या कागजों में ही बन गया मजबूत पुल?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य पूरी गुणवत्ता और तकनीकी मानकों के अनुसार किया गया होता, तो चार महीने में सड़क के नीचे इतनी बड़ी खाली जगह कैसे बन गई? आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद एप्रोच रोड पहली ही बारिश में क्यों धंस गया?
यह सवाल अब सीधे निर्माण एजेंसी, ठेकेदार और गुणवत्ता की निगरानी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी पर खड़े हो रहे हैं।
विभाग की मॉनिटरिंग पर भी उठे सवाल
हर बड़े निर्माण कार्य में विभागीय इंजीनियरों और अधिकारियों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण एवं गुणवत्ता परीक्षण का दावा किया जाता है। लेकिन यदि वास्तव में नियमित निरीक्षण हुआ था, तो इतनी गंभीर खामी आखिर कैसे छूट गई? क्या गुणवत्ता परीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहा? क्या निर्माण के दौरान मानकों से समझौता किया गया? इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग को देना होगा।
करोड़ों की लागत, लेकिन पहली बारिश में ही भरोसा टूटा
ग्रामीणों का कहना है कि जिस पुल का वर्षों से इंतजार था, उसी पुल ने कुछ ही महीनों में लोगों का भरोसा तोड़ दिया। पुल बनने से क्षेत्र के हजारों लोगों को राहत मिली थी, लेकिन अब एप्रोच रोड में बने सुरंगनुमा गड्ढे ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। लोगों का कहना है कि यदि अभी से यह हाल है तो आने वाले वर्षों में पुल की स्थिति क्या होगी?
किसकी जिम्मेदारी तय होगी?
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि यदि निर्माण में अनियमितता हुई है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या केवल गड्ढा भरकर मामले को दबा दिया जाएगा या फिर करोड़ों रुपये की परियोजना की तकनीकी जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होगी?
लोगों का कहना है कि जनता के टैक्स के पैसे से बने पुल में यदि चार महीने के भीतर ही इस तरह की स्थिति बन रही है तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का मामला है।

उच्च स्तरीय तकनीकी जांच की मांग
ग्रामीणों ने राज्य शासन से मांग की है कि पुल एवं एप्रोच रोड के निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी समिति से उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही निर्माण में प्रयुक्त सामग्री, भराई कार्य, कॉम्पेक्शन, डिज़ाइन, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच कराई जाए। यदि जांच में लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित ठेकेदार, निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
20 वर्षों के संघर्ष के बाद मिली सौगात यदि चार महीने में ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो यह केवल एक पुल का मामला नहीं, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। अब पूरे जिले की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है या फिर मामला केवल खानापूर्ति तक सिमट कर रह जाता है।

Satyanarayan Vishwakarma serves as the Chief Editor of Samwad Express, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering topics such as local and regional developments

















