(संवाद एक्सप्रेस)गरियाबंद। गरियाबंद शहर में बारिश कोई मेहमान नहीं है, जो अचानक आकर पालिका प्रशासन को चौंका दे। बारिश हर साल आती है, जलभराव हर साल होता है और इसके साथ हर साल वही पुराना सवाल भी लौट आता है—आखिर शहर का पानी जाएगा कहां?
शहर में विकास की सड़कें भले चमचमा रही हों, सड़कें चौड़ी हो गई हों और निर्माण कार्यों के आंकड़े करोड़ों में पहुंच गए हों, लेकिन बारिश होते ही गरियाबंद की तस्वीर कुछ ऐसी बन जाती है, मानो विकास की सारी योजनाएं पानी में तैरने लगी हों।
पुराने नीम रपटा क्षेत्र में बारिश के बाद बने जलभराव ने वर्षों पुरानी यादें फिर ताजा कर दीं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यहां पानी की तेज धार बहती थी और लोग उसे पार कर आवाजाही करते थे, अब सड़कें आधुनिक हैं, डामर चमक रहा है, लेकिन पानी निकलने की व्यवस्था देखकर लगता है कि ड्रेनेज सिस्टम अभी भी पुराने जमाने की यादों में ही अटका हुआ है।
सड़कें ऊपर उठीं, पानी नीचे ही रह गया!
गरियाबंद जिला मुख्यालय बनने के बाद शहर में काफी बदलाव हुए। सड़कें चौड़ी हुईं, नए निर्माण हुए और विकास की तस्वीरें भी खूब दिखाई गईं। लेकिन शहर के कई हिस्सों में बारिश का पानी निकलने का रास्ता आज भी तलाशता नजर आता है।
कहने को शहर आधुनिक हो रहा है, लेकिन जलनिकासी की समस्या देखकर सवाल उठता है कि शहर का विकास हुआ या सिर्फ सड़क की ऊंचाई बढ़ी?

नीम रपटा क्षेत्र इसका जीता-जागता उदाहरण है। बारिश होते ही सड़क पर पानी जमा और लोगों की परेशानी शुरू। ऐसे में सवाल यह है कि जब यह समस्या हर साल सामने आती है, तो इसका स्थायी इलाज अब तक क्यों नहीं हुआ?
अधूरी नालियां बोलीं—बारिश आ गई, हम अभी अधूरे हैं!
नेशनल हाईवे पर सड़क चौड़ीकरण के साथ नाली निर्माण का काम शुरू हुआ, लेकिन बारिश आने तक कई स्थानों पर निर्माण अधूरा रह गया। अब नतीजा सामने है—पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिला तो उसने सड़क को ही अपना ठिकाना बना लिया।
बारिश से पहले अधूरे निर्माण पूरे क्यों नहीं हुए? वैकल्पिक जलनिकासी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? और अगर बारिश की संभावना पहले से रहती है तो इसकी तैयारी आखिर किस स्तर पर हुई?
इन सवालों का जवाब शहर की सड़कों पर जमा पानी खुद देता नजर आ रहा है।
नालियां हैं, मगर ढूंढनी पड़ रही हैं!
शहर में कई जगह सड़क किनारे बनी दुकानों और अन्य अवरोधों के कारण नालियां ढंक गई हैं। सफाईकर्मियों की पहुंच बाधित होने और कचरा जमा होने से जलनिकासी व्यवस्था और कमजोर हो गई है।
जिला अस्पताल जाने वाली सड़क पर भी बारिश के बाद मटमैला पानी जमा होना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। एक तरफ चमचमाती डामर सड़क, दूसरी तरफ उसमें जमा गंदा पानी—मानो विकास की सड़क पर जलनिकासी व्यवस्था का ‘फोटोशूट’ चल रहा हो।
तीन दिन की बारिश ने दिखाई पूरी तस्वीर
जुलाई में 27, 28 और 29 तारीख को हुई मूसलाधार बारिश के दौरान नीम रपटा क्षेत्र में घुटने से ऊपर तक पानी भर गया था। हालात ऐसे बने कि लोगों की आवाजाही लगभग ठप हो गई और आम जनजीवन प्रभावित हुआ।
यानी समस्या कोई आज की नहीं है। जुलाई की बारिश ने बाकायदा चेतावनी दे दी थी। लेकिन करीब दो माह बाद भी यदि उसी स्थान पर स्थायी समाधान नजर नहीं आता, तो सवाल उठना लाजिमी है कि जुलाई की बारिश से सबक लिया गया या पानी उतरने के साथ मामला भी बह गया?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पालिका और सड़क चौड़ीकरण का काम कर रहे एनएच विभाग के बीच पर्याप्त समन्वय नहीं होने का खामियाजा आम जनता भुगत रही है। निर्माण के दौरान बारिश के पानी की निकासी के लिए ठोस वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने से समस्या और बढ़ी।
आला अफसर और नेता रोज गुजरते हैं, पानी फिर भी नहीं ‘गुजरता’!
नीम रपटा शहर के प्रमुख मार्ग पर है। इसी रास्ते से जिले के आला अधिकारी, जनप्रतिनिधि और नेता लगातार गुजरते हैं। यानी समस्या किसी गली के अंतिम छोर पर छिपी हुई नहीं है, बल्कि सत्ता और प्रशासन की आवाजाही वाले मुख्य मार्ग पर ही बैठी है।
फिर भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होना लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का सवाल सीधा है—जब जिम्मेदारों की गाड़ियों के सामने जलभराव दिखाई देता है, तो आम लोगों की परेशानी दूर करने के लिए कार्रवाई का पानी आखिर कब बहेगा?

विकास की चमक के बीच जलभराव का ‘दाग’
नगर में करोड़ों रुपये के विकास कार्य होने के दावे हैं। सड़कें बनीं, निर्माण हुए और शहर का चेहरा बदलने की कोशिश हुई। लेकिन यदि बारिश के दिनों में सड़क पर गंदा पानी जमा हो जाए, नालियां जाम हो जाएं और लोगों का आवागमन प्रभावित हो जाए, तो फिर विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गरियाबंद के पास समग्र और दीर्घकालीन जलनिकासी का कोई मास्टर प्लान है?
यदि है तो उसका असर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा? और यदि नहीं है, तो करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के बीच शहर की सबसे बुनियादी जरूरत अब तक योजना से बाहर क्यों है?
पालिका अध्यक्ष की सुस्ती पर सवाल, करोड़ों के काम के बाद भी शहर क्यों बेहाल?
नगर पालिका में एक बार फिर भाजपा का अध्यक्ष चुना गया है। यह तीसरी बार है जब जनता ने भाजपा पर भरोसा जताया है। ऐसे में नगरवासियों को उम्मीद थी कि तीसरे जनादेश के बाद शहर की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
लेकिन वर्तमान पालिका अध्यक्ष रिखीराम यादव की कार्यप्रणाली और विकास कार्यों की धीमी रफ्तार को लेकर अब लोगों के बीच चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
जब नगर में करोड़ों रुपये खर्च होने की बात सामने आती है, तब लोगों की अपेक्षा भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। जनता यह जानना चाहती है कि यदि इतना पैसा विकास पर खर्च हो रहा है तो फिर बारिश में सड़कें पानी-पानी क्यों हो रही हैं?
क्या विकास का पैसा सड़क तक पहुंच रहा है, लेकिन विकास की योजना नाली तक नहीं पहुंच पा रही?
तीसरी बार मिले जनादेश के बाद अब लोगों की नजर पालिका अध्यक्ष के कामकाज पर है। जनता को भाषण या दावे नहीं, बल्कि बारिश में सूखी सड़कें और व्यवस्थित जलनिकासी चाहिए।
अब फोटो नहीं, समाधान चाहिए
हर बारिश के बाद जलभराव की तस्वीर सामने आए, कुछ दिनों तक चर्चा हो और पानी उतरते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाए—यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा?
नगरवासियों की मांग है कि जलभराव वाले स्थानों को चिन्हित कर स्थायी जलनिकासी व्यवस्था बनाई जाए। अधूरी नालियों और सड़क निर्माण को जल्द पूरा किया जाए, नालियों से अतिक्रमण और कचरा हटाया जाए तथा पालिका और एनएच विभाग के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।
क्योंकि बारिश हर साल आएगी। सवाल यह है कि अगली बारिश में फिर वही तस्वीर दिखाई देगी या इस बार पालिका सचमुच पानी को रास्ता दिखाएगी?

Satyanarayan Vishwakarma serves as the Chief Editor of Samwad Express, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering topics such as local and regional developments











