(संवाद एक्सप्रेस)गरियाबंद। जिले में इन दिनों विकास का एक नया मॉडल सामने आया है — दिन में प्रतिबंध, रात में खनन!
जहां एक ओर प्रशासन ने गर्मी और जल संकट को देखते हुए 1 अप्रैल से 30 जून तक बोरवेल खनन पर सख्त रोक लगा रखी है, वहीं दूसरी ओर “जमीनी स्तर” पर यह प्रतिबंध बड़ी शालीनता से नजरअंदाज किया जा रहा है।
ग्राम सढ़ौली, छिंदोला, खुर्सीपार मोहलाई और छुरा क्षेत्र में रात ढलते ही बोर मशीनों की गूंज सुनाई देती है। लगता है जैसे ये मशीनें भी सरकारी आदेश पढ़ती हैं — “दिन में आराम, रात में काम!”

सूत्र बताते हैं कि गरियाबंद-रायपुर रोड पर शाम होते ही बोरवेल फर्म की गाड़ियां ऐसे सक्रिय हो जाती हैं, मानो कोई नाइट शिफ्ट की ड्यूटी हो। अंधेरा होते ही ये गाड़ियां अपने “सीक्रेट मिशन” पर निकल पड़ती हैं और देखते ही देखते धरती का सीना छलनी कर देती हैं।
इधर प्रशासन का कहना है कि “हमें कोई शिकायत नहीं मिली।”
उधर गांव वाले सोच रहे हैं कि शायद शिकायत भी रात में ही करनी पड़ेगी, तभी सुनी जाएगी!
बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में दलालों का एक मजबूत नेटवर्क भी सक्रिय है, जो हर बोरवेल के साथ “कमीशन की गहराई” भी नाप रहा है। यानी पानी मिले न मिले, कुछ लोगों की जेब जरूर भर रही है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस तरह अंधाधुंध खनन से भूजल स्तर तेजी से गिर सकता है। लेकिन फिलहाल तो हालात ये हैं कि भूजल से ज्यादा तेजी से प्रशासनिक जवाबदेही नीचे जा रही है।
अनुविभागीय अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि अब मामले की जांच होगी। यानी अभी तक जो कुछ हुआ, वो शायद “डेमो वर्जन” था — असली कार्रवाई अब शुरू होगी!
अब सवाल वही पुराना है, लेकिन जवाब नया चाहिए —
जब प्रतिबंध लागू है, तो ये बोरवेल आखिर किसकी अनुमति से “धरती में घुसपैठ” कर रहे हैं?
फिलहाल, गरियाबंद में जल संरक्षण का नारा कुछ यूं सुनाई दे रहा है —
“पानी बचाओ… लेकिन पहले बोर तो खोद लो!”

Satyanarayan Vishwakarma serves as the Chief Editor of Samwad Express, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering topics such as local and regional developments

















