रिपोर्टर नाग्रेद्र दुबे
(संवाद एक्सप्रेस)चिरमिरी। एमसीबी चिरमिरी के पौड़ी स्थित मंगल भवन में श्रीराम कथा आयोजन कमेटी के द्वारा 09 मई को तीसरे दौर की बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में कमेटी द्वारा नियुक्त किए गए विभिन्न व्यवस्थाओं के प्रभारी सहित उनके सहयोगी सदस्यों तथा आम जन मानस के साथ पत्रकारों को भी आमंत्रित किया गया । बताया गया कि आगामी 17 मई से 26 मई तह चिरमिरी के गोदरीपारा लाल बहादुर शास्त्री में पद्मनाभूषित परम पूज्य अनंत श्री जगत गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महराज के दिव्य वचनों का रसपान क्षेत्रवासियों को करने का लाभ मिलेगा। उक्त बैठक का मुख्य उद्वेश्य तैयारियों के अंतिम चरण का जायजा लेना था। संरक्षक के रूप में शामिल प्रदेश के केबिनेट मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने उपस्थित सभी प्रभारियों और कमेटी के सदस्यों से जानकारी प्राप्त कर आवश्यक प्रगति रिपोर्ट पर अपनी बात रखी। चूंकि क्षेत्र के लिए यह धर्म आस्था से जुड़ा सबसे बड़ा आयोजन है इसलिए श्री जायसवाल स्वयं एक – एक छोटी से छोटी चीजों पर अपनी नजर बनाए हुए है ताकि राम कथा के आयोजन दौरान कोई चूक ना हो।
स्वामी रामभद्राचार्य का संक्षिप्त परिचय
स्वामी रामभद्राचार्य (जन्म 14 जनवरी 1950) भारतीय हिंदू धर्मगुरु, शिक्षाविद्, संस्कृत पंडित, कवि, दार्शनिक और समाजसेवी हैं। वे चित्रकूट स्थित तुलसी पीठाधीश्वर तथा जगद्गुरु रामानंदाचार्य परंपरा के प्रमुख आचार्य हैं। नेत्रहीन होने के बावजूद उन्होंने शास्त्र, साहित्य और समाज सेवा में असाधारण योगदान दिया है।
प्रमुख तथ्य
जन्म: 14 जनवरी 1950, जौनपुर, उत्तर प्रदेश।
मूल नाम: गिरिधर मिश्र।
सम्मान: पद्म विभूषण (2015)।
संस्थापक: तुलसी पीठ, जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट।
भाषा दक्षता: लगभग 22 भाषाओं में दक्ष।
प्रसिद्ध शिष्य: आचार्य धीरेंद्र शास्त्री (बागेश्वर धाम) या औपचारिक शिष्य।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
रामभद्राचार्य का जन्म सरयूपारी ब्राह्मण परिवार में हुआ। दो माह की आयु में ट्रेकोमा संक्रमण से उनकी दृष्टि चली गई वही कुछेक लोगों का मत है कि वे बचपन से ही दृष्टिहीन रहे। उन्होंने औपचारिक शिक्षा 17 वर्ष की उम्र में शुरू की और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री, आचार्य और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कीं। वे ब्रेल का प्रयोग नहीं करते और स्मरण शक्ति से अध्ययन व लेखन करते हैं।
आध्यात्मिक और शैक्षिक योगदान
1987 में उन्होंने तुलसी पीठ की स्थापना की, जो धार्मिक और सामाजिक कार्यों का केंद्र है। 2001 में उन्होंने चित्रकूट में विश्व का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय — जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय — स्थापित किया, जहां वे आजीवन कुलाधिपति हैं।
साहित्यिक और दार्शनिक कृतित्व
रामभद्राचार्य ने संस्कृत, हिंदी और अवधी में 200 से अधिक ग्रंथों की रचना की है। उनके प्रमुख कार्यों में श्रीराघवकृपाभाष्यम (प्रस्थानत्रयी पर भाष्य) और श्रीभगवदाचार्यं महाकाव्य शामिल हैं किंतु श्रीभगवदाचार्य महाकाव्य को लेकर यहां भी मतों में भेद है जिसकी पुष्टि नहीं है। उन्होंने 600 वर्षों बाद रामानंद संप्रदाय में नया शास्त्रीय भाष्य प्रस्तुत किया, जिसका विमोचन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। यह दवा उनके अनुयायियों द्वारा किया जाता है।
सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका
वे धार्मिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर मुखर रहते हैं। उन्होंने राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट में गवाही दी, जिसमें उनके शास्त्रीय प्रमाणों ने निर्णय को प्रभावित किया।
सम्मान और प्रभाव
स्वामी रामभद्राचार्य को भारतीय संस्कृति, संस्कृत साहित्य और दिव्यांगजन उत्थान के लिए पद्म विभूषण, साहित्य अकादमी जैसे अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनका जीवन अदम्य संकल्प, स्मरणशक्ति और सेवा-भाव का प्रेरक उदाहरण माना जाता है।

Satyanarayan Vishwakarma serves as the Chief Editor of Samwad Express, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering topics such as local and regional developments

















